रविवार, 27 मार्च 2011

विकिलिंक्स का भुत

विकिलिंक्स का भुत जिसको पकड़ लेता है. उसी की परेशानी बढ जा रही है. अभी ये भुत अरुण जेटली को पकड़ा है. कल तक भाजपा नेता मुछों पर ताव दे रहे थे, आज जम्हाई ले रहे हैं. जो भी हो आम आदमी तो समझ ही नहीं सकता है कि सत्ता के खेल में क्या क्या होता है,पर इतना समझ तो सबको है कि चोर-सिपाही का खेल क्या होता है. खेल में कभी आप चोर बनेगे, कभी हम.
नितिन गडकरी ने अर्जुन मुंडा को क्लीन-चिट दिया है कि अच्छा कम हो रहा है. लेकिन इधर के कुछ दिनों में ये सरकार कुछ उलुल जुलूल सठियाये सा फैसला ले रही है. या परस्पर सदस्य नीतिगत बातों पर एक दुसरे से उलझ रहे हैं. सड़क के नाम पर डीजल पेट्रोल पर दो रूपये शेष कि कुछ लोग बात कर रहे हैं तो कुछ बिरोध कर रहें है. पर जो भी हो आज के दिन में डीजल- पेट्रोल जितना मूल्य में जनता खरीदती है उसका 18 से 20 पर्तिशत vat के रूप में झारखण्ड सरकार के पास जाता है. क्या 60 रूपये के एक लीटर पेट्रोल में 12 रूपये पा कर भी सरकार खुश नहीं है. क्या ये 12 रुपया से रोड का कम नहीं चल रहा है. या ये राशी घपला-घोटाला के लिए कम पड़ जा रहा है. पूरा दुनिया इस सचाई को जानती है कि डीजल पेट्रोल का दम बढ़ना महंगाई बढ़ना होता है. और उसमे भी जिस राज्य में डीजल का दम ज्यादा होता है उस राज्य में बाहर यानि दुशरे राज्य कि गाड़िया तेल नहीं खरीदती है. झारखण्ड में तेल का उत्पादन भी नहीं होता है.सिर्फ बाहर से आ कर बिकता है. मुंडा सरकार को जन-हित में सोचना चाहिए. गावं के एक साधारण आदमी कि तरह सोचना चाहिए.

शनिवार, 26 मार्च 2011

कृषि प्रधान देश

भारत कृषि प्रधान देश है. ८५% आबादी गावों में रहती है. गरीवी रेखा के निचे के तमाम लोग गावों में रहते हैं. लेकिन ताज्जुब है की गावों से सम्बंधित कोई भी खबर मिडिया में नहीं आती. प्रेमचंद के होरी, गोबर अब कही नहीं दिखते. मैला आँचल की कमली आब किसी डॉक्टर बाबु को नहों जानती या कोई डॉक्टर बाबु किसी कमली को जानते हैं. गावं के ही बच्चे नौकरी या व्यवसाय के लिए परदेश जा कर जब गावं लौटते हैं, तो उन्हें फगुवा, चैता आनाड़ी लोगों का गायन लगता है. बाहर का यह प्रदुषित ब्यार, या बिषानु गावों में,सहज ही आ रहा है.
शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल गावों में है. किसी भी स्कूल में क्लास की गिनती से शिक्षक नहीं हैं, अगर पहला से छठा तक छ: क्लास है तो साधारण ज्ञान कहता है कि छ: शिक्षक चाहिए लेकिन सच्चाई है कि बच्चों कि गिनती पर शिक्षक हैं. किसी स्कूल में एक,किसी में दो.ऊपर से शिक्षकों को जनगणना, पेड़ गणना, सुआर गणना, इत्यादि कामों में लगा दिया जाता है. ज्यादातर जंगली पहाड़ी स्कूलों में पुलिस का कैंप चलता है.हलाकि नक्सलियों के विरोध के चलते अब देर सवेर सरकारी तंत्र का नींद खुली है और स्कूलों से पुलिस कैंप हटने लगे है.
स्वस्थ्य के नाम पर सरकारी तंत्र चाहे जितना दंभ भरे, पर गावों में एक भी डॉक्टर नहीं है ये कटु सत्य है. शहर के डॉक्टर किसी न किसी प्रखंड या अनुमंडल के होते हुए भी शहर में प्रैक्टिस करते हैं. क्रूरता तो डाक्टरों में हद तक दिखती है. निरीह गरीब ग्रामीण मरीजो से कोई भी मरौवत कि बात नहीं करते हैं. जीवन का भय दिखा कर पैसा लूटने में अधिकतर डाक्टर अपना शान समझते है. बिना जरुरत एक्सरे करवाना पथोलोजिकल टेस्ट करवाना आम बात है. नीम हकीमों के भरेसे गावों कि जिंदगी है. भले ही कानून कि नज़र में नीम हकीम गुनाहगार हैं. पर ग्रामीण लोगों के लिए bhagwan हैं. इतनी खर्चीली चिकित्सा ग्रामीणों, के बूते नहीं है. बड़ी बीमारी के लिए भले ही सरकार के पास अनुदान देने कि ब्यवस्था हो पर आज तक मैंने ऐसे किसी किसमतावान को गावं में नहीं देखा
सरकारी-तंत्र ये भी देखे कि गावों के दुर्दशा के कौन जिम्मेदार हैं? खेतों में पानी नहीं पहुचता है,इसके वावजूद भी क्या किसानो से पनिवट लिया जा रहा है? अगर हाँ तो क्यों ? झूठे मुक़दमे में कितने लोग प्रेषण हो रहे है?
गावों में भारत के अन- दाता वसते हैं.इनकी दुर्दशा पर समय रहते ध्यान देना चाहिए. इनके लिए कानून के साथ-साथ,व्यावहारिक बातों को भी ध्यान रखते हुए इनको इनके हक़ तक उचा उठाना चाहिए.