रविवार, 26 दिसंबर 2010

देश को बचाना होगा

सरकार जब भ्रष्ट होती हैं, तब जनता बगावत करती है, फिर शुरू होता है दमन का सिलसिलाहालाकि दमन से बगावत और तेज हो जाता है। आजादी के बाद आम लोगो ने जो सपना देखा था, वो सपना चूर-चूर हो गया है,और आम लोगो को ये लगने लगा है, कि एक लड़ाई अंग्रेजों को भागने से भी बड़ी, लड़नी पड़ेगीयुवा उग्रवाद का रास्ता यूँ ही नहीं पकड़ रहे हैं, इस रास्ते को पकड़ने के लिए तमाम जरुरी कारण सता पर बैठे भ्रष्ट लोग पैदा कर रहे हैं।

आज मेरे जैसा आदमी ये सोचने पर मजबूर है कि अंग्रेजो को भागने के लिए क्यों आन्दोलन चलाया गया? उस समय भारत में विकास नहीं हो रहा था? लोगों को जरुरी आवश्कताएं पूरी नहीं हो रही थी? अगर सब हो रहा था तो देशवासी क्यों आंदोलित हुए?

भारतेंदु हरिश्चंद ने लिखा है,अंग्रेजी राज सजे सुख्साज, पर सब धन विदेश चली जात हैंये धन विदेश जाना ही अगर गुलामी है तो सवाल उठता है कि आजादी के बाद से अब तक 66000 हजार करोर रुपया swish बैंक के खाते में विदेशो में पड़ा हैं। यह भी गुलामी ही हैइन अंग्रेजों के औलादों से भी तो एक लड़ाई लड़नी पड़ेगी। सवाल यह भी उठता हैं कि हमारी लोकतंत्र में, हमारी कानून में कौन सी खामिया हैंजो इतनी रुपयों कि लूट हो गई, इतनी बड़ी रकम देश से बहार चला गया और हम देखते ही रह गए?

रविवार, 26 सितंबर 2010

अघोषित आपातकाल के दौर में मीडिया

अरुंधती राय किसी दवाव में नहीं रहती है. सच्चाई कहने में डरती नहीं है उनकी यह निडरता मुझे पसंद है. दो टूक उनके विचार आप भी देखे.
-----राजेश----









लोकतंत्र के पहरुए और चौथे स्तंभ की भूमिका से नवाजे जा चुके मीडिया की खबरें क्या हमेशा तटस्थ रही हैं. राष्ट्रीय आपातकाल के समय कई बार मीडिया को लेकर कसीदे क़ढ़े गये कि मीडिया सरकार के हाथों की कठपुतली बन गया है. क्या आज के दौर में मीडिया अपने सामाजिक दायित्वों के साथ न्याय कर पा रहा है. या फ़िर कॉरपोरेट और सरकार के बीच में पिस रहा है. कई सामाजिक मुद्दों पर मीडिया के कवरेज को कठघरे में खड़ा कर रही हैं -अरुंधति रॉय

1. समानता अभी भी दूर की सोच है. गरीबों को गरीबी की दलदल में ढकेला जा रहा है.
2. न्याय और बराबरी का सपना देखने और मांग करने वाले लोग पुलिस की पिटाई के जरिये खामोश कर दिये गये.


3. चमीडिया ने बहुत सी झूठी कहानियां गढ़ी हैं जिसमें एक कहानी यह भी थी कि माओवादी मारे गये पुलिसवालों के शवों का अंग-भंग कर रहे हैं.


4. इमरजेंसी के दिनों में यह कहावत आम थी कि जब इंदिरा गांधी ने प्रेस को झुकने के लिए कहा तो प्रेस रेंगने लगा.

25जून 1975 की आधी रात को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लागू की थी. इसके जरिये अपने खिलाफ़ उठे शुरूआती विद्रोह को दबाना ही उनका मकसद था. लेकिन स्थिति पहले की तुलना में और भी भयानक हो गयी. लोगों की सलामती और उचित न्याय पहले के तरह ही एक सपना ही रह गया. उस समय बंगाल में नक्सलवादियों का उदय हो रहा था. लेकिन लाखों लोग जयप्रकाश के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे. सभी की एक मांग थी.

किसानों के लिए जमीन मिले. आज
35वर्ष बाद परिस्थितियों में भयानक बदलाव आया है. मानव अधिकारों के रूप में न्याय की भावना आयी है. समानता अभी भी दूर की सोच है. गरीबों को गरीबी की दलदल में ढकेला जा रहा है. बीच भूमि के बंटवारे का एक तरीका ये हो सकता है कि धनी लोगों से भूमि को छीन कर भूमिहीनों को दे दें. ज्यादतर भूमिहीन,बेरोजगार, स्लम बस्ती में रहने वाले और शहरी काम-काजी किसी गिनती में नहीं हैं.

पश्चिम बंगाल के लालगढ़ जैसे जगहों में लोग पुलिस और सरकार से उन्हें अकेला छोड़ देने की मांग करते हैं. पुलिस रुक-रुक कर हिंसा बढ़ाती है. इसका लोग गुस्से से इजहार करते हैं. इन दो सालों के अंतराल में ही उस जगह से रेप
, हत्या और फ़रजी एंकाउटर के कितने मामले उजागर हुए हैं.पीसीएपीए को एक माओवादी संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया गया है.

(इसी तरह से ओड़िसा के नारायण पटना में चासी मूल्या आदिवासी संघ और पोटका झारखंड में विस्थापन विरोधी एकता मंच को भी प्रतिबंधित किया गया)न्याय और बराबरी का सपना देखने और जोतने वालों के लिए जमीन की मांग करने वाले लोग पुलिस की पिटाई के जरिये खामोश कर दिये गये हैं और माफ़ी मांगने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं.

या यही विकास है
? इमरजेंसी के दिनों में यह कहावत चलती थी कि जब इंदिरा गांधी ने प्रेस को झुकने के लिए कहा तो प्रेस रेंगने लगा. लेकिन तब भी बहुत से राष्ट्रीय अखबारों ने नाफ़रमानी की और सेंसर का विरोध संपादकीय पृष्ठ को बिना कुछ लिखे सादा ही निकाला.

(यह भी विडंबना ही है कि उन बागी संपादकों में से एक थे वीजी वर्गीज) इस बार अघोषित आपातकाल के दौर में इस तरह की बगावत की कोई संभावना नहीं है क्योंकि मीडिया खुद ही सरकार बन गया है. इसे नियंत्रित करने वाले कारपोरेट घरानों के अलावा कोई भी नहीं बता सकता कि इन्हें क्या करना चाहिए. वरिष्ठ राजनेता और बड़े सुरक्षा अधिकारी टीवी पर अर्नब गोस्वामी या बरखा दत्त के सामने दिन के ओखरी कर्मकांड में हस्तक्षेप करने के लिए गिड़गिड़ाते देखे जा सकते हैं.

बहुत से टीवी चैनल और अखबार ऑपरेशन ग्रीन हंट के युद्धकक्ष को मूर्त रूप देते हुए उनके गलत सूचनाओं के प्रसारण में सीधे-सीधे हिस्सेदार हैं.
1500 करोड़ का माओवादी उद्योग जैसे एक ही शीर्षक से कई अखबारों में खबरें छपी थीं. लगभग सभी अखबारों और समाचार चैनलों में पीसीएसीए को (जिसे बार-बार माओवादी भी कहा जा रहा था) पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में ट्रेन को पटरी से उतारने की भयानक घटना के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा था, जिसमें 140लोगों की मृत्यु हुई थी.

मुख्य आरोपियों में से दो को पुलिस तथाकथित एन्काउन्टर में मार चुकी है लेकिन इस हादसे के रहस्य से अभी तक पर्दा नहीं उठा है. प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया ने बहुत सी झूठी कहानियां गढ़ी जो इंडियन एक्सप्रेस ने लगातार छापी. इनमें से एक कहानी यह भी थी कि माओवादी मारे गये पुलिसवालों के शवों का अंग-भंग कर रहे हैं.

(पुलिस की तरफ़ से ही ऐसी घटना से इनकार की खबर डाक टिकट के आकार में कहीं बीच के पृष्ठ पर छिपाकर छापी गयीथी.) माओवादी गुरिल्ला महिलाओं के ऐसे बहुत से इंटरव्यू छापे जाते हैं जिनमें वे बताती हैं कि कैसे माओवादी नेताओं ने उनके साथ बलात्कार किया और बार-बार बलात्कार किया. ऐसी महिलाओं के बारे में बताया जाता है कि वे अभी-अभी जंगल और माओवादियों के चंगुल से बचकर किसी तरह बाहर आयी हैं ताकि अपनी कहानी दुनिया को सुना सकें.

बाद में इस बात का पर्दाफ़ाश हुआ कि वह कई महीनों से पुलिस की हिरासत में थी.दुर्घटना आधारित विेषण करते हुए हमारी टीवी स्क्रीन पर जिस तरह से चीखा जाता है वह हमें इस चिंता में डुबाने की कोशिश करता है कि
‘‘हां ओदवासियों को नजरअंदाज किया गया है. वे बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं, उन्हें विकास चाहिए और इस सबके लिए सरकार जिम्मेदार है. लेकिन अभी संकट का समय है.

हम माओवादियों से मुक्ति चाहते हैं
, पहले देश की रक्षा कर लें फ़िर हम ओदवासियों की मदद करेंगे.’’जैसे-जैसे युद्ध करीब आता गया है सशस्त्र बलों ने भी घोषणा कर दी है (जिस तरीके से वे कर सकते हैं) कि वे भी अब हमारे सिर पर नाचने के लिए तैयार हो रहे हैं. कुछ ही दिनों बाद नक्सल प्रभावित राज्यों ने मुख्यमंत्रियों ने निर्णय लिया कि नक्सल विरोधी युद्ध को तेज किया जाए. बड़े पैमाने पर सशस्त्र बलों की भरती और नक्सल प्रभावित इलाकों में उनकी तैनाती का दौर जारी है.

कुछ ही समय पहले सेनाध्यक्ष ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को
नक्सलवाद से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने को कहा. उन्होंने कहा कि ‘‘इसमें 6 महीने लग सकते हैं या फ़िर एक या दो साल. लेकिन अगर हमें राज्य के हाथ में एक औजार के बतौर अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखना है तो हमें वे चीजें करनी पड़ेंगी, जिनकी उम्मीद राष्ट्र हमसे करता है.



शनिवार, 25 सितंबर 2010

विहार का दुःख

विहार में विधान सभा चुनाव की घोषणा हो गई. तरह-तरह की पार्टियाँ दिखने लगी हैं. गठबंधन बनाने में नेता व्यस्त हो गए हैं. जदयु और बीजेपी गठजोड़ तो शासन में है ही. विपक्षी दलों में मुख्य राजद लोजपा गठजोड़ मैदान में मजबूती से है.पांच सालों के लिए बिहार का भविष्य तय होना है.
रामविलास पासवान और लालू यादव में मेल समय की मज़बूरी है. नितीश कुमार मुख्य मंत्री न बने इसके लिए यह मेल है. नितीश कुमार मुख्य मंत्री नहीं बने होते अगर इस चुनाव के पहले वाले चुनाव में लालू जी के नेतृत्व में सरकार का गठन हो गया होता. लेकिन राम विलास जी के वजह से दुबारा राज्य में चुनाव हुआ . और नितीश जी मुख्य मंत्री बने.
बिहार में बहुत विकाश हुआ है. ऐसा प्रचारित किया जा रहा है. पर ऐसा बात नहीं हैं तुलनात्मक पिछली सरकार से ज्यादा जरुर हुआ है. चुकि पहले से तस्वीर इतनी ख़राब है कि अभी कुछ भी हुआ, ज्यादा ही लग रहा है. इस चुनाव में बिहार कि जनता के सामने विकाश कोई मुद्दा नहीं है. कानून ब्यवस्था ठीक हुआ है. लेकिन चुनाव में ये वि मुद्दा नहीं है.
मतदान में जात-पात एक आवश्यक बिंदु होता है. इस समीकरण को बनाने में जो सफल होगा सरकार उसी कि बनेगी. जो भी हो सरकार बने.जो भी सरकार बनाये बिहार का विकाश करे. कानून ब्यवस्था ठीक करे, पढ़ाई लिखाई ठीक करे,रोजगार पैदा करे. आजादी के बाद बिहार विकाश में तीसरे नंबर पर था.पर आज अंतिम पर है. इस बात का प्रयास हो कि बिहार एक नंबर पर आ जाये.
बिहारी पुरे देश में अपमानित होते है. बिहारियों को प्रतिस्था मिले इसके लिए पहल हो. हमलोगों को तीसरे चौथे क्लास में पढाया जाता था कि बिहार के पिछड़ेपन के क्या कारण है. जबाब रटवाया जाता था. कि यहाँ के लोग निकम्मे है. कामचोर है. इस तरह कि पढाई बच्चों को न पढाया जाय.

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

राष्ट्रभाषा का सवाल आज भी यछ प्रश्न
बन कर खड़ा हैं आज के दिन ह
संविधान सभा की बैठक में डा राजेंद्र प्रसाद ने सदस्यों को राजी करा लिया था
कि हिंदी संपर्क भाषा रहेंगी अंगरेजी अचानक नहीं हटाई जाएगी 15 सालों कि लम्बी अवधी में इसे धीरे धीरे हटा लिया जायेंगा यह घटना 1949 की है . 14 नवम्बर 1949 को एक तरह से अंग्रेजी को जीवन दान मिला .और यह तय नहीं हो सका कि राज-काज की भाषा अंग्रेजी के जाने के बाद क्या होंगी .अंग्रेजी के पहले राज-काज की भाषा फारसी थी.अंग्रेजो के आने के बाद फारसी के जगह अंग्रेजी को स्थापित अंग्रेजो ने किया क्यों कि इसके बिना
भारत पर उनका कब्ज़ा संभव नहीं था . विकास के लिए मातृभाषा आवश्यक है ऐसा अंग्रेजों का मानना था.फारसी हटाने के पीछे यही मान्यता थी किसी भारतीय भाषा पर सहमती नहीं बनी. होना यह चाहिए था. कि दक्छिन भाषी लोग आन्दोलन करते कि हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं रहेगी इसके जगह दक्छिन भारतीय भाषा रहेगी. भारतीय भाषा बनाम हिंदी होना चाहिए था लेकिन हुआ अंग्रेजी बनाम हिंदी .अंग्रेजी में ही काम-काज होता रहा इस अम्विधन सभा में प्रत्यक्छ रूप से हिंदी की आलोचना की गयी और परोक्छ रूप से अंग्रेजी का गुणगान.1951 के सर्वे में मात्र 2% लोग ही अंग्रेजी के जानकार थे 150 साल के अंग्रेजी राज में मात्र 2% चौकाने वाला सच था . कोई भी भारतीय भाषा के जानकार इस 2% से ज्यादा ही थे . हम इस से इंकार नहीं कर सकते की 98% लोगो पर अंग्रेजी थोपा गया .कुछ लोगो का तर्क है कि अंग्रेजी से भारत का बिकास हुआ पर यह सोचने वाली बात है कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहा अंग्रेजी काम नहीं आती रूस जैसे देशों में वह की भाषा सिख कर ही वहा का पढ़ाई किया जाता है . कई देश के लोग तो भारतियों की अंग्रेजी बोलते देख हँसते हैं . यानि मजाक उड़ाते हैं .उन लोगो का मानना है की अंग्रेजी जानना विद्वता है तो इंग्लॅण्ड के मुर्ख भी अंग्रेजी बोलते है .

सोमवार, 6 सितंबर 2010

9 दिन के बाद आखिर बिहार पुलिस के तिन सदस्य सकुसल नक्सलियों के द्वारा छोड़ दिए गए. इसके लिए नक्सली बधाई के पात्र है. लेकिन एक दुखद बात ये हुई की लूकस टेटे की हत्या से माहौल गमगीन हो गया. लूकस टेटे की हत्या नहीं करनी चाहिए थी. पिछले दिनों नक्सली नेता आजाद की हत्या हो गयी थी. आरोप लगा था कि पुलिस ने पकड़ कर मार दिया. स्वामी अग्निवेश 23 अगस्त को पटना नरेन्द्र पाठक कि किताब के विमोचन के अवसर पर आये हुए थे. उनका कहना था कि आजाद मेरे कहने पर दिल्ली आया था. मैंने चिदम्बरम जी के कहने पर बात-चित के लिए उसे बुलाया था. लौटने के क्रम में पुलिस वाले पिछा कर उसे छल से मार दिए. मानवाधिकार का हनन हुआ है. इसकी जाँच होनी चाहिए. हम लोग स्वामी अग्निवेश के साथ हैं.
लेकिन लूकस टेटे कि हत्या के लिए नक्सलियों को माफ नहीं किया जा सकता हैं. अगर मानवाधिकार कि दुहाई पुलिस अत्याचार के लिए है, तो यह नक्सलियों के लिए भी हैं. ये अलग बात है कि पुलिस वाले इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं. और नक्सली पर कोई कानून लागु नहीं होता. नक्सली अगर अपने को गरीबो के रहनुमा कहते हैं तो उन्हें इस बात कि गारंटी लेनी होगी कि मानवाधिकार का उलंघन नहीं हो.
इस 9 दिनों में अनेक तरह के नौटंकी हुए. इसी नौटंकी कि एक कड़ी थी किसन जी के नाम से हेमंत यादव का प्रकट होना और अभय यादव कि पत्नी से राखी बंधवा कर घोषणा करना कि जाओ तुम्हारे पति को सकुशल रिहा कर दिया गया है. सौभाग्यवती रहो. हेमंत यादव गोविन्द पुर धनबाद का रहने वाला है. १९९५ में बिहार विधान सभा के चुनाव में दानापुर में मुझे मिला था. उस समय लाल्लू यादव के खिलाफ में प्रचार करना चाहता था. १५ अगस्त ९५ को बिहारविधान सभा में नंगे हो कर झंडा फहराने के आरोप में गिरफ्तार हुआ था. उसने बयाव्स्था के के खिलाफ अपना आक्रोश का इजहार किया था. वह उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति है और उसे व्यवस्था से आक्रोश है. भाषण उसका ओज पूर्ण होता है. वह राम अवधेश सिंह के लिए प्रचार किया था.
बिहार सरकार कि भूमिका अच्छी रही. सर्वदलीय बैठक में रामबिलास और लाल्लू जी का नहीं रहना अच्छा नहीं लगा.
अब पुलिस के सामने एक चुनौती है. कि नक्सलियों कि बढती ताकत को रोके.आखिर जनता का मन नक्सलियों ने कैसे जीता? जनता के सहयोग के बिना इतना बड़ा संगठन चलाना मुश्किल है. पुलिस प्रशासन को भ्रष्टाचार से दूर रहना होगा नहीं तो इसी तरह जान बचाना मुश्किल हो जायेगा. दमन अत्याचार कि निति छोडनी होगी.सरकार को भी भ्रष्ट मुक्त होना होगा

रविवार, 29 अगस्त 2010

आवाज

भारत गांवों का देश हैं .देश के गावं से ही जयादातर जन-प्रतिनिधि चुन कर संसद में जाते हैं और जा कर भारत की गरिमा बढ़ाते हैं . मुझे एक बात अक्सर अखरती है कि शपथ-ग्रहण से ही संविधान तोड़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है .मैं संविधान को अछुन रखूँगा, और बदले कि भावना से कुछ भी नहीं करूँगा.इसके बाद जो भी होता है ,बदले कि भावना से होता है. विकाश राशी का बटवारा हो या सांसद महोदय के फंड से, पावर से. भेद भाव शुरु हो जाता हैं कि इसने वोट दिया उसने नहीं दिया. जनता वेवस हैं .जनता लाचार हैं. गीता का उपदेश रग-रग में समाया हुआ हैं कि किस्मत कि बात हैं,हम क्या ले कर आये थे जो पाना है ,सुख-दुःख पूर्वजन्म का खेल है लोगों को ये भी पता नहीं है कि वोट क्या है इसकी शक्ति कितनी बड़ी है. लोगों को लगता है कि हमारे एक वोट से कोई राजा बन जाता है तो हमें क्या हर्ज है . मै गावं में रहता हूँ ,गावों कि हालत जनता हूँ. गरीवी, कल्पना से भी ज्यादा हैं, लोग 5 किलोमीटर तक कि दूरी पैदल तय करते है 2 रुपया बचाने के लिए. अभावो से त्रस्त व्यक्ति को कोई 100 रूपये कि मदद कर दे तो वह उसके लिए भगवान हो जायेगा और वोट क्या जान भी देना छोटी बात होगी. .