शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

क्षेत्रवाद का जहर

. मराठी बनाम उत्तर भारतीय की लड़ाई का मकशद शुद्ध रूप से भारत को कमजोर करने का है. इस ओछी हरकत से तत्काल कुर्सी का लाभ मिल जाता है. इस तरह की लड़ाई अगर अन्य राज के लोग भी छेड़ दे तो मुंबई की चमक-दमक फीकी पड़ जाएगी. चाचा-भतीजा की बोलती बंद हो जाएगी. “सामना” का दुकान बंद हो जायेगा और कुर्सी में पहिया लग जायेगा.
. . मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है. विश्व पटल पर मुंबई का अपना स्थान है. वाणिज्यिक राजधानी भारत का मुंबई ही है. इसे सवारने में, इसे गढ़ने में देशवाशियों का योगदान है. झारखण्ड अगर कोयला भेजता है, तो ओड़िसा लोहा. सीमेंट बनाने के लिए लाइम स्टोन भी दुसरे राज्यों से ही महाराष्ट्र में जाता है. इस लिए हम कह सकते हैं की महाराष्ट्र भारत का है और पुरे देश के खून पसीने से सिच कर इसे सवारा गया है. यहाँ फ़िल्म-जगत को अन्य राज्य से पहुचें लड़के लड़किओं ने अपना अभिनय कला से, अपनी प्रतिभा से अंतराष्ट्रीय जगत में ख्याति दिलवाया है.
.. . बाल ठाकरें, और राज ठाकरे की दुकान क्षेत्रवाद से ही चलती है. ये स्वार्थी लोग क्षेत्रवाद के भ्रम जाल में जितने अधिक लोगों को फसायेंगे उतना ही ज्यादा इनका उल्लू सीधा होगा. लोगों का, महाराष्ट्रवासियों का विकाश हो या न हो इनका विकाश होते रहेगा. वंशवाद का बेल बढ़ता रहेगा.
.. . पूरी दुनिया जानती है की क्षेत्र वाद से विकास नहीं बिनाश होता है. किसी भी देश को कमजोर करने का सफल तरीका क्षेत्र वाद ही है. दुश्मन देश इस तकनीक पर अरबों रूपये पानी की तरह बहाते है. अपने एजेंट पाल कर रखते है. इस कार्य को कराने के लिए सारी सुबिधा मुहैया करते है. इस क्षेत्रवाद से देश या राज्य का भला कभी न होता है, न होगा.
.. स्थानीय बनाम बाहरी का नारा राजनीती प्रेरित है. इसे हम ओछी राजनीती कह सकते है. दुशरे राज्य के मजदुर बद से बदतर स्थिति में रह कर अपना जीवन-यापन करते है. एक तंग कोठारी में 15 -20 व्यक्ति रह कर तथा 15 -16 घंटे काम कर के किसी तरह कुछ रूपये बचा कर घर भेजते है. भला ऐसे लोगों से महाराष्ट्र को क्या घाटा हो सकता है? भूंजा बेचने वालों टेम्पो चलाने वालों पर अपनी बहादुरी दिखाना कायरता की चरम पराकाष्टा है. पिछले सालों एक भुजा के दुकान को लुटते हुए टीवी चैनलों पर दिखाया गया था. राज ठाकरे का आन्दोलन के दौरान ये घटनाये घटी थी. बिहार के एक लड़के की जान ले ली गयी थी, वो बेचारा रेलवे का परीक्षा देने गया था. देश का सर शर्मिंदगी से उस दिन पुरे विश्व में झुक गया था. राज ठाकरे की विजय अभियान से सारा देश हतप्रभ था. और ताज्जुब की राज को कुछ न हुआ.गृह मंत्री देखते रह गए. साशन तंत्र देखता रह गया.
.. .. भेदभाव वाली राजनीति करने वाले समूहों और व्यक्तियों को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए, साथ ही साथ अलग से कानून बना कर एक साल के अन्दर सजा देने का प्रावधान होना चाहिए. नहीं तो अलगाव वादी ताकतों को बल मिलेगा और देश कमजोर होगा. पूरब-पश्चिम के झगडे में लाचार लोगों मजदूरों की जान जाती रहेगी

सोमवार, 1 अगस्त 2011

लोकतंत्र खतरे में है. विधायिका भ्रष्ट है.न्यायपालिका लापरवाह और गैरजिम्मेदार है. कार्य-पालिका, विधायिका औरन्यायपालिका के लोगों के बचाने में परेशान है. जनता किसके पास जाये किससे आशा करे. अपने ही बुने जाल मेंफँसगईहै.
रामदेव जी को रामलीला मैदान से बेशर्मी से खदेड़ा गया. उससे भी बेशर्मी से सीबीआई को पीछे दौड़ा दिया गया.जनता भौचक हो कर देखती रही कि आखिर रामदेव जी तो देश हित की ही बात कर रहे थे, कला धन,और भरष्टाचार पर ही तो आवाज़ उठा रहे थे. सीबीआई कि भूमिका पहले से ही दागदार थी अब और विकृत हो गया.
अन्नाहजारे के साथ जनता कि भावना जुडी हुयी है. बिना जनभावना के कोई भी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता, सत्ता के मद में सरकार इस बात को भूल गई है. आनन-फानन में लोकपाल बिल संसद में पास कराने की तैयारी का मतलब क्या है ? कई दौर के वार्ता में एक पक्षीय लोकपाल बिल का क्या मतलब है ? कानून तो पहले से ही भरे हुए हैं भ्रष्टाचारियों के खिलाफ, पर नतीजा क्या निकलता है. कभी दूर संचार मंत्री, फसते है, तो कभी प्रधान मंत्री का ही नाम आ जाता है. स्विस बैंक में जमा रूपये आखिर किस रास्ते गए ? देश में तो एक से बढ़कर एक कानून है. जनता कि गाढ़ी कमाई क्या लुटने के लिए ही सरकार का मतलब है?
अन्ना हजारे को अनशन करने का इजाजत नहीं मिला. लोकतंत्र में यह खतरनाक प्रवृति है. इतनी बड़ी दिल्ली भारत कि राजधानी इतनी छोटी कैसे हो गई ? सत्याग्रह के लिए इजाजत नहीं देने वाली सरकार लोकतान्त्रिक है कैसे? जनता को इस मौन प्रश्न का जवाव चाहिए.
मामला बढ़ रहा है. जनता को सड़क पर उतारने की गलती सरकार कर रही है. लोकनायक जय प्रकाश नारायण को इमरजेंसी के दौरान जेल में बंद कर दिया गया, नतीजा निकला कि हजारो युवक सड़कों पर लोकनायक जय प्रकाश नारायण के समर्थन में उतर पड़े. सरकार कि हेकड़ी बंद हो गई, आपस में विरोध हो गया, और शासन तंत्र धरासायी हो गया था.
अन्ना जी को रोका जायेगा सत्याग्रह के लिए. 144 धारा लगाया जायेगा तो निश्चित ही कानून टूटेगा. अन्ना हजारे गिरफ्तार होंगे तो निश्चित ही अन्ना के समर्थन में जन सैलाब उमडेगा. लोकतान्त्रिक देश के नागरिक लोकतंत्र को कभी खतरे मई नहीं देखना चाहते हैं.
दिनकर जी ने लिखा है- जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

राज को बिहार भेजो

मुंबई में हुए एक बाद एक तीन धमाकों के दो दिन बाद आखिर में एमएनएस(या हम आतंकवादी प्रमुख भी कह सकते हैं) प्रमुख राज ठाकरे ने अपनी पाकिस्तान सहयोगी बयाँ उगल ही दिया. इस बयाँ के बदले राज ठाकरे को पाकिस्तानी खुफिया किस तरह से उपकृत करती है इस पर नज़र रखनी चाहिए. अभी चाचा बाल ठाकरे चुप हैं.पर एक या दो दिन बाद वो भी सुर में सुर मिलायेंगे.

“जब तक यूपी-बिहार के लोग आते रहेंगे मुंबई में धमाके होते रहेंगे” राज ठाकरे के इस बयाँ ने सिद्ध कर दिया है कि राज ठाकरे जब तक महाराष्ट्र में रहेंगे आतंकियों को पनाह मिलता रहेगा.मुंबई तस्करी का प्रमुख अड्डा हैं लेकिन इस पर कभी राज कि आवाज नहीं उभरी, देह व्यापर पर चुप्पी नहीं टूटी, तमाम करप्सन को प्रश्रय देने वाले राज के राज में मेहनत-कसों कि सामत है.
देश का बिभाजन कि बात अप्रत्याक्छ्य रूप में करने वाले राज ठाकरे को महाराष्ट्र में रहने का कोई अधिकार नहीं है. मैं सर्वोच्च नयायालय के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह करूँगा कि राज ठाकरे पर एक मुकदमा दायर हो और इसका फैसला हो कि राज ठाकरे को कम से कम १० साल तक बिहार में रहना पड़े. बुध्द कि भूमि गुरु गोबिंद सिंह कि जन्मस्थली में आ कर राज कि आवाज ठीक हो जाएगी और सुबुद्धि प्राप्त हो जाएगी.
मुंबई वासियों को भी एक ISI एजेंट से छुटकारा मिलेगा.निश्चित ही इस तरह के बिघटनकारी लोगो के हटते मुंबई में शांति हो जाएगी.

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रविवार, 27 मार्च 2011

विकिलिंक्स का भुत

विकिलिंक्स का भुत जिसको पकड़ लेता है. उसी की परेशानी बढ जा रही है. अभी ये भुत अरुण जेटली को पकड़ा है. कल तक भाजपा नेता मुछों पर ताव दे रहे थे, आज जम्हाई ले रहे हैं. जो भी हो आम आदमी तो समझ ही नहीं सकता है कि सत्ता के खेल में क्या क्या होता है,पर इतना समझ तो सबको है कि चोर-सिपाही का खेल क्या होता है. खेल में कभी आप चोर बनेगे, कभी हम.
नितिन गडकरी ने अर्जुन मुंडा को क्लीन-चिट दिया है कि अच्छा कम हो रहा है. लेकिन इधर के कुछ दिनों में ये सरकार कुछ उलुल जुलूल सठियाये सा फैसला ले रही है. या परस्पर सदस्य नीतिगत बातों पर एक दुसरे से उलझ रहे हैं. सड़क के नाम पर डीजल पेट्रोल पर दो रूपये शेष कि कुछ लोग बात कर रहे हैं तो कुछ बिरोध कर रहें है. पर जो भी हो आज के दिन में डीजल- पेट्रोल जितना मूल्य में जनता खरीदती है उसका 18 से 20 पर्तिशत vat के रूप में झारखण्ड सरकार के पास जाता है. क्या 60 रूपये के एक लीटर पेट्रोल में 12 रूपये पा कर भी सरकार खुश नहीं है. क्या ये 12 रुपया से रोड का कम नहीं चल रहा है. या ये राशी घपला-घोटाला के लिए कम पड़ जा रहा है. पूरा दुनिया इस सचाई को जानती है कि डीजल पेट्रोल का दम बढ़ना महंगाई बढ़ना होता है. और उसमे भी जिस राज्य में डीजल का दम ज्यादा होता है उस राज्य में बाहर यानि दुशरे राज्य कि गाड़िया तेल नहीं खरीदती है. झारखण्ड में तेल का उत्पादन भी नहीं होता है.सिर्फ बाहर से आ कर बिकता है. मुंडा सरकार को जन-हित में सोचना चाहिए. गावं के एक साधारण आदमी कि तरह सोचना चाहिए.

शनिवार, 26 मार्च 2011

कृषि प्रधान देश

भारत कृषि प्रधान देश है. ८५% आबादी गावों में रहती है. गरीवी रेखा के निचे के तमाम लोग गावों में रहते हैं. लेकिन ताज्जुब है की गावों से सम्बंधित कोई भी खबर मिडिया में नहीं आती. प्रेमचंद के होरी, गोबर अब कही नहीं दिखते. मैला आँचल की कमली आब किसी डॉक्टर बाबु को नहों जानती या कोई डॉक्टर बाबु किसी कमली को जानते हैं. गावं के ही बच्चे नौकरी या व्यवसाय के लिए परदेश जा कर जब गावं लौटते हैं, तो उन्हें फगुवा, चैता आनाड़ी लोगों का गायन लगता है. बाहर का यह प्रदुषित ब्यार, या बिषानु गावों में,सहज ही आ रहा है.
शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल गावों में है. किसी भी स्कूल में क्लास की गिनती से शिक्षक नहीं हैं, अगर पहला से छठा तक छ: क्लास है तो साधारण ज्ञान कहता है कि छ: शिक्षक चाहिए लेकिन सच्चाई है कि बच्चों कि गिनती पर शिक्षक हैं. किसी स्कूल में एक,किसी में दो.ऊपर से शिक्षकों को जनगणना, पेड़ गणना, सुआर गणना, इत्यादि कामों में लगा दिया जाता है. ज्यादातर जंगली पहाड़ी स्कूलों में पुलिस का कैंप चलता है.हलाकि नक्सलियों के विरोध के चलते अब देर सवेर सरकारी तंत्र का नींद खुली है और स्कूलों से पुलिस कैंप हटने लगे है.
स्वस्थ्य के नाम पर सरकारी तंत्र चाहे जितना दंभ भरे, पर गावों में एक भी डॉक्टर नहीं है ये कटु सत्य है. शहर के डॉक्टर किसी न किसी प्रखंड या अनुमंडल के होते हुए भी शहर में प्रैक्टिस करते हैं. क्रूरता तो डाक्टरों में हद तक दिखती है. निरीह गरीब ग्रामीण मरीजो से कोई भी मरौवत कि बात नहीं करते हैं. जीवन का भय दिखा कर पैसा लूटने में अधिकतर डाक्टर अपना शान समझते है. बिना जरुरत एक्सरे करवाना पथोलोजिकल टेस्ट करवाना आम बात है. नीम हकीमों के भरेसे गावों कि जिंदगी है. भले ही कानून कि नज़र में नीम हकीम गुनाहगार हैं. पर ग्रामीण लोगों के लिए bhagwan हैं. इतनी खर्चीली चिकित्सा ग्रामीणों, के बूते नहीं है. बड़ी बीमारी के लिए भले ही सरकार के पास अनुदान देने कि ब्यवस्था हो पर आज तक मैंने ऐसे किसी किसमतावान को गावं में नहीं देखा
सरकारी-तंत्र ये भी देखे कि गावों के दुर्दशा के कौन जिम्मेदार हैं? खेतों में पानी नहीं पहुचता है,इसके वावजूद भी क्या किसानो से पनिवट लिया जा रहा है? अगर हाँ तो क्यों ? झूठे मुक़दमे में कितने लोग प्रेषण हो रहे है?
गावों में भारत के अन- दाता वसते हैं.इनकी दुर्दशा पर समय रहते ध्यान देना चाहिए. इनके लिए कानून के साथ-साथ,व्यावहारिक बातों को भी ध्यान रखते हुए इनको इनके हक़ तक उचा उठाना चाहिए.

शनिवार, 22 जनवरी 2011

भारतीय पत्रकारिता का स्वरुप

भारतीय पत्रकारिता का स्वरुप किसी जादूगर के जादू सा बदल गया है. 29 जनवरी 1780 को जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट भारतीय समाचार पत्र का प्रकाशन की शुरुआत की तो उन्होंने लिखा कि सबके लिए पर किसी से प्रभावित नहीं और इसके बाद समाचार पत्रों को स्वतंत्रता से जोड़ कर देखा गया.1950 जनवरी 26 को भारतीय गणतंत्र तक निर्विक और ईमानदारी के रूप में पत्रकारों कि छवि बनी रही अकबर इलाहाबादी ने शेर में लिखा कि तोप हो मुकाबिल तो अख़बार निकालो. और इस तरह आजादी की लड़ाई में अख़बारों और पत्रकारों की भूमिका आम जन के आकांछा के अनुरूप रही. कलम की ताकत तोप और बन्दुक पर भरी पड़ने लगी. आजादी के बाद व्ययासयियों ने इस ताकत को व्ययसाय के रूप में देखना शुरु किया. पत्रकारों की मदद से व्यवसायी, सता को धमकाने लगे. फिर भी एक गरिमा पत्रकारों की बनी रही. इधर जब से सुचना तकनीक का फैलाव हुआ और मिडिया का व्यापक स्वरुप लोगो के सामने आया. तब से एक बिकृत चेहरा भी सामने आया. पत्रकार चारण बन गए और रुपयों के पीछे भागने लगे. चाहे पत्रकारों कि जो भी मज़बूरी रही हो., जैसे प्रवंधन से विज्ञापन का दबाव, लेखन के, या संवाद संकलन के बदले कोई भुगतान नहीं.
ओक्टुबर-नवम्बर बिहार बिधान सभा के सन्देश विधान सभा के ncp के उमीदवार जितेंदर ने बताया की दश हजार रूपये का का बिग्यापन नहीं देने पर कोई भी समाचार-पत्र मेरे बारे में कुछ भी नहीं लिखेगा. यही माप-दंड था की जो जितना ज्यादा देगा उतना ही ज्यादा खबर में रहेगा. झारखण्ड, हजारीबाग में कई पत्रकार एसे है जो रूपये के लिएव्यवसायियों व प्रशासनिक पदाधिकारियों को ब्लैक-मेल करते हैं और मांगे पूरी नहीं होने पर उल्टा सीधा खवर बनाते हैं
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से दलालों को भागने के लिए जनता को ब्यापक अभियान चलाना होगा. बुद्धिजीवियों और अच्छे विवेकवान मिडिया-कर्मियों को ऐसे मिडिया के दलालों को खदेड़ना होगा.