शनिवार, 22 जनवरी 2011

भारतीय पत्रकारिता का स्वरुप

भारतीय पत्रकारिता का स्वरुप किसी जादूगर के जादू सा बदल गया है. 29 जनवरी 1780 को जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट भारतीय समाचार पत्र का प्रकाशन की शुरुआत की तो उन्होंने लिखा कि सबके लिए पर किसी से प्रभावित नहीं और इसके बाद समाचार पत्रों को स्वतंत्रता से जोड़ कर देखा गया.1950 जनवरी 26 को भारतीय गणतंत्र तक निर्विक और ईमानदारी के रूप में पत्रकारों कि छवि बनी रही अकबर इलाहाबादी ने शेर में लिखा कि तोप हो मुकाबिल तो अख़बार निकालो. और इस तरह आजादी की लड़ाई में अख़बारों और पत्रकारों की भूमिका आम जन के आकांछा के अनुरूप रही. कलम की ताकत तोप और बन्दुक पर भरी पड़ने लगी. आजादी के बाद व्ययासयियों ने इस ताकत को व्ययसाय के रूप में देखना शुरु किया. पत्रकारों की मदद से व्यवसायी, सता को धमकाने लगे. फिर भी एक गरिमा पत्रकारों की बनी रही. इधर जब से सुचना तकनीक का फैलाव हुआ और मिडिया का व्यापक स्वरुप लोगो के सामने आया. तब से एक बिकृत चेहरा भी सामने आया. पत्रकार चारण बन गए और रुपयों के पीछे भागने लगे. चाहे पत्रकारों कि जो भी मज़बूरी रही हो., जैसे प्रवंधन से विज्ञापन का दबाव, लेखन के, या संवाद संकलन के बदले कोई भुगतान नहीं.
ओक्टुबर-नवम्बर बिहार बिधान सभा के सन्देश विधान सभा के ncp के उमीदवार जितेंदर ने बताया की दश हजार रूपये का का बिग्यापन नहीं देने पर कोई भी समाचार-पत्र मेरे बारे में कुछ भी नहीं लिखेगा. यही माप-दंड था की जो जितना ज्यादा देगा उतना ही ज्यादा खबर में रहेगा. झारखण्ड, हजारीबाग में कई पत्रकार एसे है जो रूपये के लिएव्यवसायियों व प्रशासनिक पदाधिकारियों को ब्लैक-मेल करते हैं और मांगे पूरी नहीं होने पर उल्टा सीधा खवर बनाते हैं
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से दलालों को भागने के लिए जनता को ब्यापक अभियान चलाना होगा. बुद्धिजीवियों और अच्छे विवेकवान मिडिया-कर्मियों को ऐसे मिडिया के दलालों को खदेड़ना होगा.

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