रविवार, 29 अगस्त 2010
आवाज
भारत गांवों का देश हैं .देश के गावं से ही जयादातर जन-प्रतिनिधि चुन कर संसद में जाते हैं और जा कर भारत की गरिमा बढ़ाते हैं . मुझे एक बात अक्सर अखरती है कि शपथ-ग्रहण से ही संविधान तोड़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है .मैं संविधान को अछुन रखूँगा, और बदले कि भावना से कुछ भी नहीं करूँगा.इसके बाद जो भी होता है ,बदले कि भावना से होता है. विकाश राशी का बटवारा हो या सांसद महोदय के फंड से, पावर से. भेद भाव शुरु हो जाता हैं कि इसने वोट दिया उसने नहीं दिया. जनता वेवस हैं .जनता लाचार हैं. गीता का उपदेश रग-रग में समाया हुआ हैं कि किस्मत कि बात हैं,हम क्या ले कर आये थे जो पाना है ,सुख-दुःख पूर्वजन्म का खेल है लोगों को ये भी पता नहीं है कि वोट क्या है इसकी शक्ति कितनी बड़ी है. लोगों को लगता है कि हमारे एक वोट से कोई राजा बन जाता है तो हमें क्या हर्ज है . मै गावं में रहता हूँ ,गावों कि हालत जनता हूँ. गरीवी, कल्पना से भी ज्यादा हैं, लोग 5 किलोमीटर तक कि दूरी पैदल तय करते है 2 रुपया बचाने के लिए. अभावो से त्रस्त व्यक्ति को कोई 100 रूपये कि मदद कर दे तो वह उसके लिए भगवान हो जायेगा और वोट क्या जान भी देना छोटी बात होगी. .
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