राष्ट्रभाषा का सवाल आज भी यछ प्रश्न बन कर खड़ा हैं आज के दिन ह | | | |
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| संविधान सभा की बैठक में डा राजेंद्र प्रसाद ने सदस्यों को राजी करा लिया था |
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| कि हिंदी संपर्क भाषा रहेंगी अंगरेजी अचानक नहीं हटाई जाएगी 15 सालों कि लम्बी अवधी में | | | | | | | | | | | | | | | |
| इसे धीरे धीरे हटा लिया जायेंगा यह घटना 1949 की है . | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | |
| 14 नवम्बर 1949 को एक तरह से अंग्रेजी को जीवन दान मिला .और यह तय नहीं हो सका कि राज-काज की भाषा | | | | | | | | | | | | | | | |
| अंग्रेजी के जाने के बाद क्या होंगी .अंग्रेजी के पहले राज-काज की भाषा फारसी थी.अंग्रेजो के आने के बाद फारसी के जगह अंग्रेजी को स्थापित अंग्रेजो ने किया क्यों कि इसके बिना | | |
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| भारत पर उनका कब्ज़ा संभव नहीं था . विकास के लिए मातृभाषा आवश्यक है ऐसा अंग्रेजों का मानना था.फारसी हटाने के पीछे यही मान्यता थी | | | | | | | | | | | | | |
| किसी भारतीय भाषा पर सहमती नहीं बनी. होना यह चाहिए था. कि दक्छिन भाषी लोग आन्दोलन करते कि हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं रहेगी इसके जगह दक्छिन भारतीय | | | | | | | | | | | |
| भाषा रहेगी. भारतीय भाषा बनाम हिंदी होना चाहिए था लेकिन हुआ अंग्रेजी बनाम हिंदी .अंग्रेजी में ही काम-काज होता रहा इस अम्विधन सभा में प्रत्यक्छ रूप से हिंदी की आलोचना की गयी और परोक्छ रूप से अंग्रेजी का गुणगान.1951 के सर्वे में मात्र 2% लोग ही अंग्रेजी के जानकार थे |
| 150 साल के अंग्रेजी राज में मात्र 2% चौकाने वाला सच था . कोई भी भारतीय भाषा के जानकार इस 2% से ज्यादा ही थे . हम इस से इंकार नहीं कर सकते की 98% लोगो पर अंग्रेजी थोपा गया . | | | | | | | | | | |
| कुछ लोगो का तर्क है कि अंग्रेजी से भारत का बिकास हुआ पर यह सोचने वाली बात है कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहा अंग्रेजी काम नहीं आती | | | | | | | | | | | | | |
| रूस जैसे देशों में वह की भाषा सिख कर ही वहा का पढ़ाई किया जाता है . कई देश के लोग तो भारतियों की अंग्रेजी बोलते देख हँसते हैं . यानि मजाक उड़ाते हैं .उन लोगो का मानना है की अंग्रेजी जानना विद्वता है तो इंग्लॅण्ड के मुर्ख भी अंग्रेजी बोलते है . | | | |
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जवाब देंहटाएंभाषा कभी भी मातृभाषा के अलावा दूसरा होना पिछड़ेपन की निशानी कही जाएगी . भले आज के दिन भारतीय लोग अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करना और इस विदेशी भाषा के दम पर अपने आप को ज्यादा पढ़ा लिखा विद्वान समझना उनकी भूल है और अंग्रेज यही चाहते थे. आज हमारे देश में शिक्छा का प्रचार प्रसार कहीं ज्याद हुवा रहता, अगर हम भारतियों ने हिंदी को अपनाया होता, सरकारी काम काज भी हिंदी में किया गया होता तो सरकार ज्यादा लोगों तक पहुच सकती थी और विदेश से जो भी आते उनको एक दुभाषिये की जरुरत होती जो उनको हिंदी में समझाता और हमारे देश का गौरव बढ़ता पर अपने राजनेता और सरकार में बैठे लोग अंग्रेजों की गुलामी करना और उनके बताये रस्ते पर चलना ही सच मान बैठे हैं तो २% जिस भाषा को जाननेवाले लोग थे सन ४७ में जब अपना देश आजाद हुवा तो आज भी वही दो प्रतिशत इस देश पर राज कर रहें हैं और जैसा अंग्रेज सीखा गए "Devide and Rule" फूट डालो राज करो आज समाज जाती में बटता ही जा रहा है और फूट पड़ता ही जा रहा है वही आज हमारे देश के नेता कर रहें हैं , यह एक बहुत ही दुखद सत्य है , अभी से भी अपनी मातृभाषा हिंदी को अपनाना ही हमारे देश के गरीबों के लिए हितकर है अगर सही मायनो में हमारे राजनेता देशहित की बात सोचते हैं और देशहित या जनहित की उनको चिंता है तो फ़ौरन हमारे सारे काम काज अंग्रेजी के बजाय हिंदी में ही करने की पहल करनी चाहिए यही लोकहित में और देशहित में है .
अशोक कुमार दूबे